Thursday, December 1, 2016

प्रार्थनाएं हमेशा एकांत मांगती हैं- ब्रिटनी स्पियर्स


आज 2 दिसम्बर को ब्रिटनी स्पियर्स का जन्मदिन है. 1981 को जन्मी ब्रिटनी स्पीयर्स को हम एक पॉप सिंगर, अभिनेत्री और डांसर के रूप में तो जानते ही हैं. पिछले दिनों टाइम मैगजीन में प्रकाशित उनका एक ख़त मिला जो उन्होंने अपने बच्चों ज्यादे और प्रेस्टन को लिखा था. यह ख़त बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसमें कुछ है जो एक स्थापित व्यक्तित्व को अलग ढंग से देखने, महसूसने की सलाहियत देता है- प्रतिभा 

4 मई 2016
प्यारे ज्यादें और प्रेस्टन,

तुम दोनों मेरी सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ हो. उस दिन जब मैंने तुम्हारी मासूम, पवित्र प्यारी आँखों को पहली बार देखा था तबसे मैं चमत्कारों पर यकीन करने लगी. ओह, कितना खूब्सूरत तोहफा ईश्वर ने मुझे दिया है. तुम्हारी प्यारी मासूम दुनिया में शामिल होकर मुझे हर रोज़ यह एहसास होता है. मैं एक माँ के तौर पर तुम्हारे लिए प्रार्थना करती हूँ कि ईश्वर तुम्हें दुनिया के तमाम संघर्षों का सामना करने की शक्ति और इच्छा प्रदान करें.

तुम्हें पता है मेरे बच्चों, ईश्वर हमारे पास दबे पांव, चुपचाप आते हैं. मैं कामना करती हूँ कि तुम उसके आने की खामोश आहटों को सुन सको और अपनी आत्मा की आवाज़ सुनने के सही मायने समझ सको.

हमेशा खुद पर बहुत यकीन करना मेरे बच्चो, और यह बात समझना कि इस जिन्दगी में असंभव कुछ भी नहीं. मैं दुआ करती हूँ कि तुम खुली आखों से सपने देखो, ढेर सारे सपने, और जिन्दगी की बेइंतिहा संभावनाओं तक पहुँच सको. आशा करती हूँ कि जिन्दगी की तमाम कीमती रहस्यों से तुम वाकिफ हो सको, अपने व्यक्तित्व की फैलती हुई चमक को लेकर तुम कभी संकोच मत करना.

मेरे बच्चो, तुम यह बात समझोगे कि प्रार्थनाएं हमेशा एकांत मांगती हैं. समझोगे तुम कि एकांत में ही हम असल में ईश्वर से जुड़ पाते हैं और तब तुम जानोगे कि तुम कभी अकेले नहीं हो. ईश्वर हमेशा तुम्हारे साथ है.

मैं तुम्हारी ख़ुशी के लिए दुआ करती हूँ, चाहती हूँ प्यार से जीते हुए जिन्दगी की तमाम बुलंदियों तक पहुँचो.

तुम्हारी माँ
ब्रिटनी

Saturday, November 26, 2016

जलने दो लोगों को-दोस्तोएवस्की


दोस्तोएवस्की का पत्र ऐना के नाम 

प्रिये,

तुम लिखती हो- मुझे प्यार करो! पर क्या मैं तुम्हें प्यार नहीं करता? असल बात यह है कि ऐसा शब्दों में कहना मेरी प्रवृत्ति के खिलाफ है। तुमने खुद भी इसे महसूस किया होगा लेकिन अफसोस तुम महसूस करना जानती ही नहीं अगर जानती होती, तो ऐसी शिकायत कभी नहीं करती।मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं अब तक तुम्हें पता होना चाहिए था लेकिन तुम कुछ समझना नहीं चाहतीं। मैं अभिव्यक्तियों में विश्वास नहीं करता महसूस करने में करता हूं. अब यह भाषणनुमा पत्र लिखना बंद कर रहा हूं.

तुम्हारे पैरों की उंगलियों का चुंबन लेने के लिए मैं तड़प रहा हूं.

तुम कहती हो कि अगर कोई हमारे पत्र पढ़ ले तो क्या हो? ठीक है, पढऩे दो लोगों को और जलन महसूस करने दो।

हमेशा तुम्हारा
दोस्तोएवस्की

(दोस्तोवस्की: क्राइम और पनिश्मेंट का लेखक फ्योदोर दोस्तोवस्की. दुनिया बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार, जिसको राजद्रोह के अपराध में मृत्युदंड दे दिया गया, पर ठीक फांसी के समय पर वह दंड सात साल के साइबेरिया से निष्कासन में परिवर्तित कर दिया गया)

Tuesday, November 22, 2016

आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली...



मीना कुमारी एक ऐसा नाम है जो सिर्फ गुज़र नहीं जाता, वो एहसास से चिपक जाता है. उनकी अदायगी, उनके अल्फाज़ और ज़िन्दगी से उनका रिश्ता...कॉलेज के ज़माने में ये नज़्म इस कदर मेरे पीछे पड़ी थी कि इसी में मुब्तिला रहने की बेताबी थी...जैसे कोई नशा हो...हल्का हल्का सा...रगों में घुलता हुआ...घूँट घूँट हलक से उतरता हुआ...दर्द का नशा...मीना आपा ने इस नशे को भरपूर जिया...ज़िन्दगी ने उनके साथ मुरव्वत की ही नहीं और एक रोज़ आज़िज़ आकर उन्होंने ज़िन्दगी से कहा, 'चल जा री जिन्दगी...'

हिंदी कविता ने एक बार मीना आपा का जादू फिर से जगा दिया है...बेहद खूबसूरत है ये अंदाज़ ए बयां...रश्मि अग्रवाल जी ने उन्हें याद करते हुए अपने भीतर ही मानो ज़ज्ब कर लिया हो...बाद मुद्दत फिर से मीना आपा हर वक़्त साथ रहने लगी हैं....दिन हैं कि अब भी टुकड़े टुकड़े ही बीत रहे हैं...शुक्रिया मनीष इस अमानत को इस तरह संजोने के लिए....

- मीना कुमारी 

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली

video

Thursday, November 17, 2016

छाना बिलौरी का घाम....



बेसबब जागती रातों को परे धकिया कर, दौड़ती-भागती जिन्दगी में से कोई सुबह चुरा लेने का बड़ा सुख होता है. उन सुबहों को सेब, नाशपाती, पुलम आदि के फूलों के बीच अंजुरियों में भरते हुए, भीमताल की टेढ़ी-मेढ़ी सी सडक पे इक्क्म दुक्क्म खेलती धूप को देखते हुए, ऊंची पहाड़ियों के बीच ख़ामोशी से ठहरी हुई झील के किनारे से गुजरते हुए या कभी किसी चाय के ढाबे के किनारे बैठकर पीते हुए कडक चाय, सुनते हुए पहाड़ी (कुमाउनी) धुन...जिन्दगी...हथेलियों पे रेंगती हुई मालूम होती है...कभी पलकों की कोरों पर अटकी हुई भी महसूस होती है...वो पहाड़ी धुन आहिस्ता आहिस्ता फिजाओं में घुलती रहती है...रगों में भी घुलती है हौले से...

बरस बीत गया वो धुन अब भी रगों में रेंगती है...कभी साँसों में सुलगती है...कई रोज से ये धुन सर पे सवार है...छाना बिलौरी का घाम...जिसमे एक बेटी अपने बाबुल को कह रही है कि ओ बाबुल, मुझे छाना बिलौरी यानि जहाँ बहुत तेज़ धूप पड़ती है वहां मत ब्याहना वरना मैं वहां किस तरह रह पाऊंगी, किस तरह काम कर पाऊँगी....

ये कुमाउनी गीत मेरे लिए भूपेन जी की आवाज में ही दर्ज है...हालाँकि इसके मूल गायक हैं गोपाल दा यानि गोपाल बाबू गोस्वामी...बाद में इसे कई लोगों ने इसे अपनी अपनी तरह से गाया...गाते रहेंगे....

इस गीत को सुनते हुए सोचती हूँ इस बरस भी वैसे रास्ते फूलों से भरे होंगे, फयूली वैसे ही फूली होगी, बच्चे स्कूल जाते हुए शरारतें करते जाते होंगे, नन्ही सी पगडण्डी पे वो अकेला पेड़ अब भी मुस्कुरता होगा, अब भी झील के किनारों पे रंगीन नाव सजी होंगी...कुछ भी कहाँ बीतता है...सात ताल के रास्तों को किस तरह हमने शरारतों से भर दिया था, देखो न ये छाना बिलौरी के घाम की तपिश में सारे बीते हुए लम्हे किस कदर चमक रहे हैं...

दोस्त कहते हैं तुम पक्की पहाड़ी हो गयी हो, मैं सुनकर ख़ुशी से झूम उठती हूँ. जिन्दगी जब पहाड़ होने लगी थी तब पहाड़ों का रुख किया था और जिस मोहब्बत से सीने से लगाया था पहाड़ों ने ऐसा लगा था कि बरसों बाद परदेस से आई बिटिया को मायके की छत मिली हो.

जन्म भले ही धरती के किसी भी कोने पे हुआ हो लेकिन महसूसने से लगता है कि इन्हीं पहाड़ों की हूँ कबसे. ये गीत सुनते हुए पहाड़ों से अपनेपन का एहसास और बढ़ता जाता है...मंडवे की रोटी की खुशबू आ रही है पास ही से....


video


Monday, November 14, 2016

तेरे इंतजार का चाँद...


किसने बगिया में खिलाया है तेरी याद का चाँद, किसने सांसों में बसाई है तेरे वस्ल की खुशबू. ये किसकी हरारत है जो सर्द मौसम में घुल गयी है...कौन है जिसकी आहटों ने धरती को सजाया है. कोई चेहरा नहीं कहीं फिर भी कोई रहता तो आसपास ही है.

हाथों की लकीरों में कहाँ ढूँढा करते, कि लकीरें तो बचपन के छ्प्पाकों में गुमा आई थी लकीरें सारी...माँ हर वक़्त मेरी तक़दीर की चिंता में माथे पे लकीरें बढ़ाये फिरती रही...उसकी माथे की लकीरें मेरी हाथों की तक़दीर कैसे होतीं...कि मेरी तक़दीर उन लकीरों से बहुत आगे थी...

जब सबकी ड्योढ़ी पे बुझ जाता पूर्णमासी चाँद, मेरी बगिया में जलता रहता तेरे इन्तजार का चाँद... बुझता ही नहीं, कोई इस बात को बूझता ही नहीं...अमावस की डाल को तोड़कर दूर कहीं फेंक आई थी...चाँद उगता है, रोज मेरे आंगन में... आज भी उगा है वैसा ही तेरे इंतजार का चाँद...और एक जगजीत सिंह हैं कि चाँद को रुखसत कर देने की रट लगाये हुए हैं...जबकि मेरे गमखाने में सिर्फ चाँद ही आ सकता है...

जगजीत सिंह मानते ही नहीं....गाये जा रहे हैं...रिपीट में...

मेरे दरवाजे से अब,चाँद को रुखसत कर दो 
साथ आया है तुम्हारे,जो तुम्हारे घर से
अपने माथे से हटा दो,ये चमकता हुआ ताज
फेंक दो जिस्म से किरनों का, सुनहरी जेवर

तुम्हीं तन्हा मेरे गमखाने में आ सकती हो
एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है
मेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँद...