Monday, August 22, 2016

मैं तुमसे कम भी नहीं हूँ



अदबी ख़ुतूत- हार्पर ली का पत्र अपनी प्रशंसिका के नाम 

मशहूर अमेरिकन लेखिका हार्पर ली से उनकी प्रशंसिका ने उनकी एक तस्वीर मांगी। वो कोई फेसबुक या ट्विटर का जमाना तो था नहीं की फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते ही उनकी तमाम तस्वीरें झोली में आ गिरें। और प्रशंसिका तो अपनी प्रिय लेखिका की तस्वीर सहेजना चाहती थी, वो भी उनके हस्ताक्षर वाली। ली के पास भी उस वक़्त कोई तस्वीर थी नहीं, लेकिन लेखक अपने पाठक के प्रति उदार न हुआ तो काहे का लेखक। ली ने उस प्रशंसिका को तुरंत एक ख़त लिख भेजा, देखिये न छोटे से इस ख़त में कितनी खूबसूरत बात है- प्रतिभा 
06/07/206

प्रिय जेरेमी,

इस वक़्त तो मेरे पास कोई ऐसी तस्वीर नहीं है जो मैं तुम्हें भेज सकूँ। लेकिन मैं तुम्हें कुछ लाइनें लिखकर भेज रही हूँ-

जब तुम बड़ी होगी, यह सच खुद भी याद रखना और सबको बताना भी, कि तुमसे कभी किसी का दिल न दुखे। कभी किसी को ये मत जताना कि तुम इस दुनिया की बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। गरीब या अमीर किसी को भी नहीं लेकिन प्रिय, किसी की भी आँख में झांकना और कहना, ‘हो सकता है मैं तुमसे बेहतर नहीं हूँ, लेकिन निश्चित रूप मैं तुमसे कम भी नहीं हूँ।’

हार्पर ली

Thursday, August 18, 2016

भीतर बाहर की यात्राओं के सुर तलाशती है “आज़ादी मेरा ब्राण्ड“



कोई भी यात्रा साहित्य क्यों लिखा जाना चाहिए, क्यों पढ़ा जाना चाहिए? आखिर कौन सी हैं वो जरूरी चीजें जो एक यात्रा के दौरान लिए गये नोट्स को, अनुभवों को यात्रा साहित्य बनाते हैं। क्या बाहर को चलना ही यात्रा है या बाहर चलने की शुरुआत पहले भीतर चलने से होती है। वो कौन सी चीजें हंै जो एक पर्यटक को यायावर से अलग करती हंै। अनुराधा बेनीवाल की पुस्तक “आजादी मेरा ब्राण्ड“ इन्हीं सवालों के आसपास से गुजरती है। यह किताब विदेश यात्राओं के दौरान हुए अनुभवों से गुजरते हुए भारतीय समाज के दरवाजे पर स्त्री चेतना को लेकर बंद कुंडियों को खटखटाती है। वो सवालों के जवाब नहीं परोसती बल्कि ढेर सारे सवालों को जन्म देती है।

कई लिहाज से यह पुस्तक महत्वपूर्ण है। एक तो यह पुस्तक ऐसे वक्त मंे आई है जब सूचनाओं और अभिव्यक्तियों का एक खुला समंदर हमारे इर्द-गिर्द लहरा रहा है इसके बावजूद यात्रा साहित्य में अब तक स्त्री यायावरों की जगह बहुत ज्यादा नहीं है। समूचे यात्रा साहित्य को देखें तो भी स्त्रियों के नाम ज्यादा सुनने में नहीं आते हैं।

जिस देश में एक लड़की दुपट्टे संभालने की कला में प्रवीणता हासिल करते हुए, बढ़ते कद के साथ झुकती गरदन और धीमी होती आवाज़ ताकीदों के साथ बड़ी होती हो, जहां एक बड़ी उम्र की लड़की को घर से अकेले भेजने पर अव्वल तो पाबंदियां ही हों लेकिन अगर भेजना ही पड़े तो उसकी सुरक्षा के लिए साथ में चार साल के भाई को भेजने का रिवाज हो, अगर पाबंदियों में जरा नर्मी आये तो शाम को सूरज ढलने से पहले वापस लौट आने की हिदायत रहती हो उस देश में स्त्रियों द्वारा लिखे गये यात्रा साहित्य की कमी को समझा जा सकता है। ऐसे में आजादी मेरा ब्राण्ड एक जरूरी किताब लगती है।

अनुराधा हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी गांव में 1986 में जन्मी एक स्त्री है। उसकी यात्रा न तो किसी काम के सिलसिले में की गई यात्रा है न जिंदगी की मुश्किलों से भागकर कहीं चले जाने की जिद से जन्मी है। एक तथाकथित आदर्श और सफल ;सैट्ल्ड जिसे कहती है दुनिया) लड़की को आखिर वो कौन सी चीज है जो खलबला के रख देती है...जिसकी तलाश में वो बिना ज्यादा रुपया, पैसा या साधन के एक बैकपैक के साथ निकल पड़ती है। वो खोज है अपने होने की। एक स्त्री किस तरह सामाजिक ढांचे में पलती है, बड़ी होती है, सफल भी होती है लेकिन अपने बारे में, अपनी भावनाओं के बारे में लगातार अनभिज्ञ रहती है। संभवतः यही खलबलाहट उसे रास्तों पर उतारती है और एक शतरंज की नेशनल चैंपियन बैकपैकर बन जाती है। जेब में यूरोप का नक्शा, थोड़े से पैसे और ढेर सारा उत्साह उसे यायावरी को उन्मुख करता है। वो जानती है कि अगर आपको दुनिया को देखना, समझना और महसूस करना है, धरती के कोने-कोने से बात करनी है तो महंगे होटलों में रुकने, महंगा खाना खाने जैसी सुविधाभोगी आदतों से निकलना होगा। कम खर्च में ज्यादा घूमने के तरीके खोजने होंगे और यह किताब बताती है कि किस तरह

घूमने के दौरान आई आर्थिक तंगी से जूझने के लिए कई बार वहीं किसी भी तरह का काम करके (क्योंकि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता) पैसे भी कमाने होते हैं और अगर कभी कैमरा-वैमरा खो जाए तो खुद को समझाना भी होता है कि जो अनुभव साथ हैं, वो कैमरे में दर्ज तस्वीरों से कहीं ज्यादा कीमती हैं।

सामान्य से काफी अच्छा जीवन जीते हुए, सफलता के उच्चतम पायदानों पर खड़ी होने के बावजूद अगर कोई लड़की अपने भीतर की उथल-पुथल को सहेज पाती है, उसे सींच पाती है और एक रोज उसी उथल-पुथल का हाथ थामकर निकल पड़ती है दुनिया घूमने तो उस उथल-पुथल की आवाज को सुना जाना जरूरी है। इस किताब से गुजरते हुए कई बार वो आवाज सुनाई देती है, कभी किताब के पन्नों से, कभी अपने भीतर से। अनुराधा लिखती है-

“मैं पैदा हुई, काॅलेज गई, शतरंज खेली, नेशनल चैम्पियन बनी, अंग्रेजी में एम. ए. किया, लाॅ किया, पत्रकारिता की पढ़ाई की, प्रेम विवाह कर घर बसाया। कहने को परफेक्ट लाईफ। और क्या चाहिए होता है एक लड़की को...कुछ नहीं न? लेकिन वह क्या था जिसे ढूंढने को मैं भीतर से उबल रही थी। मैं आजाद देश की आजाद नागरिक होकर भी कौन सी स्वतंत्रता की बात सोच रही थी?“ अनुराधा बेनीवाल की किताब आजादी मेरा ब्राण्ड को उसकी इसी उहापोह के बरअक्स पढ़ा जाने पर तमाम सवालों के जवाब भी मिलते हैं और बहुतेरे सवाल भी। यह किताब एक अकेली औरत की घुम्मकड़ी के अनुभव हैें।

यह किताब यूरोप के तमाम देशों की यात्राओं की किताब है जो पाठक को कई यात्राओं में ले जाती है। लंदन, ब्रसेल्स, पेरिस, एम्सटर्डम, बर्लिन, प्राग, ब्रातिस्लावा, बुडपोस्ट, इंसब्रुक और बर्न घूमते हुए अनुराधा के जे़हन में हिंदुस्तान का समाज, उस समाज में स्त्रियों के लिए खड़ी चुनौतियां, सामाजीकरण किस तरह स्त्रियों की सोचने और महसूसने को प्रभावित करता है आदि बातें लगातार चलती रहती हैं। पेरिस में जूही और हरेन्द्र से हुई उसकी मुलाकात उसे यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि देश की सीमाओं को पार करके, खुलेपन के नाम पर दूसरे देशों की संस्कृतियों को अपनाने के बावजूद भारतीय पुरुष सामाजीकरण के उस वर्चस्व के शिकंजे में ही कैद हैं जहां दूसरी स्त्री प्राप्त करने की वस्तु और अपनी पत्नी छुपाकर रखने की चीज है। खुद आधुनिकता और खुलेपन की तलाश में कई स्त्रियों से संबंध रखने वाला पुरुष किस तरह अपनी पत्नी के बारे में मानसिक कसावट में है, किस तरह फेसबुक पर परफेक्ट फैमिली के इश्तिहार चिपकाती स्त्रियां भीतर ही भीतर घुट रही हैं, बेचैन हैं। देश चाहे हिंदुस्तान हो या पेरिस।

अनुराधा कहती हैं कि “कैसे निकल जाऊं घर से, यों ही? घरवाले जाने देंगे? अकेले कैसे जाऊं? कितना सेफ है यों ही अनजान जगहों पर जाना? हथियार लेकर जाऊं? टिकट-विकट की बुकिंग कैसे होगी? कहां रहूंगी? क्या खाऊंगी? जैसे सवाल अगर आपके मन में हैं तो आपका मन अभी तक सच में घूमने का नहीं हुआ है। जब होगा, तब ये सवाल नहीं होंगे।”

जैसे ही हम यात्रा के लिए कदम बाहर निकालते हैं बहुत सारे डर खुद-ब-खुद ढेर हो जाते हैं। तमाम सवाल सिरे से ख़ारिज हो जाते हैं। अनुभवों का एक अलग ही संसार जन्म लेता है। ऐसा संसार जिसमें एक यात्री होते हुए तो परिष्कार होता ही है सुधी पाठक के तौर पर भी भीतर कुछ आंदोलित होता महसूस होता है। किस तरह एक यात्रा न सिर्फ दूसरे देशों की संस्कृतियांे, वहां के रहन-सहन और लोगों के व्यवहार से जोड़ती है और किस तरह अपने देश और समाज में जड़े जमा चुकीं कुछ रवायतों पर प्रश्न उठाना सिखाती है यह इस पुस्तक को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। तमाम देशों की संस्कृतियों के बीच यात्राएं ही वो पुल हैं जो हमें भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सीमाओं को तोड़ती हैं। एक-दूसरे से सीखने को उद्यत करती हैं और हमें असल में मानवीय होना सिखाती हैं।

लेकिन इस सबके लिए जरूरी है एक यायावर मन होना। एक घुम्मकड़ को अपने भीतर होने वाली खलबली को समझना होता है, उसे सहेजना होता है, खाद पानी देकर सींचना होता है। दुनिया घूमने की इच्छा असल में मात्र घूमी हुई जगहों पर टिकमार्क करना, फेसबुक अपडेट या कुछ लिखकर वाहवाही पाने से ऊपर होती है। तब ही यात्रा अपना असल काम करती है, वो यात्री को बाहर के रास्तों पर चलाते हुए भीतर ले जाती है, भीतर की तमाम जड़ताओं को धीरे-धीरे तोड़ना शुरू करती है। यही जड़ताएं यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए भी टूटती हैं। संभवतः यही वजह है कि एक यात्री, देश, धर्म जाति, संप्रदाय जैसी बंदिशों से लगातार आजाद होता जाता है। इस पुस्तक में भी सबसे पहले एक स्त्री होने की तमाम उन वर्जनाओं के टूटने की आवाज़ सुनाई देती है जो हिंदुस्तान में स्त्री की परवरिश से लेकर उसकी मृत्यु तक लगातार पैबस्त रहती है। एक स्त्री की आजादी सिर्फ उसके पहनावे, बोली, देर रात घूमने किसी के साथ भी सो सकने से ही नहीं तय होती है बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर अपने इमोशंस, अपनी हारमोनल जरूरतों के प्रति सहज होना आजादी का असल मतलब है।

एक झलक देखिए तो किस तरह एक यात्रा में अपने भीतर की तमाम गिरहों का अंदाजा मिलता है।

“जितनी गिरहें जिं़दगी की हैं, आजादी की उससे ज्यादा ही होंगी। एक को खोलिए तो दूसरा सामने एंेठा रहता है। ये सब सामाजिक सभ्यता के निर्माण की गांठे हैं, जिनसे जीवन को भले स्थायित्व मिला लेकिन पग-पग पर उसकी चाल को झटका लगा। अब मुझे नहीं मिल सकी कभी। वह ऐसी कोई बड़ी बात न थी। उसे मेरा समाज, मुझे दे सकता था। उसे मेरे आसपास के लोग मुझे दे सकते थे। परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों से वह मुझे मिलनी चाहिए थी केवल चल सकनेे की आजादी। टैम बेटैम, बेफिक्र-बिंदास, हंसते-सिर उठाए सड़क पर निकल सकने की आजादी। कुछ अनहोनी न हो जाए, इसकी चिंता किए बगैर, अकेले कहीं भी चल पड़ने की आजादी। घूमते-फिरते थक जाएं तो अकेले पार्क में बैठकर सुस्ता सकने की आजादी। नदी किनारे भटकते हुए हवा के साथ झूम सकने की आजादी जो मेरे मनुष्य होने के अहसास को गरिमा भी देती है और ठोस यकीन भी।“

जैसा कि पुस्तक की भूमिका में स्वानंद किरकिरे कहते हैं कि इस पुस्तक की भाषा इसकी जान है। लेखिका कोई साहित्यकार नहीं है और बेहद सादा तरह से अपने अनुभवों को दर्ज करती चलती हैं, इसी सादगी, साफगोई के चलते किताब सिर्फ बुकशेल्फ में नहीं दिल में जगह बनाती है। यह बात भी समझ में आती है कि दिल से महसूस किये हुए को दर्ज करना असल में इतना मुश्किल भी नहीं, बस कि हमें अपने महसूस करने और लिखने के बीच के संबंध को ईमानदारी से निभाना आता हो, बगैर भाषाई परिमार्जन की परवाह किये बगैर विधा की फिक्र किए। यह किताब कभी डायरी की शक्ल लेना हुआ नज़र आता है, कभी संस्मरण की, जैसा कि किताब के आवरण पर दर्ज भी है कि ”एक हरियाणवी छोरी की यूरोप-घुम्मकड़ी के संस्मरणों की श्रंृखला।“ यानी किस तरह साहित्य की विधाएं एक-दूसरे को आत्मसात् करती चलती हैं यह किताब इसका उदाहरण भी है।

अनुराधा जानती है कि आजादी न लेने की चीज़ है न देने की। छीनी भी तो क्या-आजादी, वो तो जीने की चीज है। सो वो जीने निकल पड़ी है ये कहते हुए कि “आज मैं घूमने निकली हूं, दुनिया घूमने, अकेेले, बिना किसी मकसद के, एकदम अवारा, बेफिक्र, बेपरवाह। आज मैं जीने निकली हूं। मैं अपनी खुशियां, अपने ग़म, अपनी हंसी, अपने आंसू खोजने निकली हूं...“

इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक भी किसी यात्रा पर निकल पड़ते हैं अपने भीतर उस खलबली की आवाज को फिर से सुन पाने की यात्रा में जिसे दुनियादारी और तथाकथित समझदारी ने कहीं दबा दिया था...

पुस्तक-आज़ादी मेरा ब्राण्ड
लेखिका-अनुराधा बेनीवाल
मूल्य- रु 199
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन


Sunday, August 14, 2016

आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया...-देवयानी भरद्वाज


चौराहे पर तिरंगा बेच रहे बच्चे के हाथ में
झंडा मुस्कराया
बच्चे ने कहा भारत माता की जय
और हाथ से गिरा सिक्का उठाने बीच सड़क की ओर भागा

खाली पड़ी इमारत में
बस्तर के जंगल में
राजमार्ग के पास खेत में
लहुलुहान मिली किशोरी के पिता को
जब डाक्टरों ने कहा
थाने में रपट लिखना फिर आना
अस्पताल की ईमारत पर लहराता झंडा मुस्कराया

सोलह बरस के बाद
इरोम ने अनशन तोडा
आज़ाद भारत की सरकारें
कुछ और मगरूर हुई
राजभवन की दीवार पर गाँधी ने ऐनक सरकाया
झंडे के साथ वे भी मुस्कराए

आंबेडकर के चरणों में
कमल का फूल अर्पित किया गया
झंडा मुस्कराया

बुलडोज़र उठा कर ले जा रहे थे
रंभाती हुई गायों को
किसी को उसके निवाले की लिए पीटा
कोई अपने रोज़गार के लिए पिटा
दारू की बोतल में पानी बेचने वाला
सबके हिस्से का माल ले कर हो गया फरार
लाल किले पर फहराया गया तिरंगा
सबकी सफ़ेद पोशाकों पर
लाल छींटे चमक रहे थे
आसमान में झंडा मुस्करा रहा था

सब तरफ है जश्न-ए-आज़ादी
आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया
जनता की आँखों में धूल है

जिनकी आँखों में नहीं धूल
उनके लिए त्रिशूल है
झंडा है कि मुस्करा रहा है...

Thursday, August 11, 2016

तुम चाहकर भी वो सब वापस नहीं ले सकते...

अदबी ख़ुतूत : ग्यारहवीं कड़ी 




सिमोन का ख़त नेल्सन के नाम
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मरिया पोपोवा को फ़्रेंच लेखिका सिमोन का ये ख़त जब मिला तो उन्हें जैसा महसूस हुआ वैसा ही कुछ मुझे भी हुआ। सिमोन की किताब ‘द सेकेण्ड सेक्स’ पढ़ते हुए चीज़ों को देखने और समझने का नज़रिया नहीं बल्कि नज़र मिलती है। सिमोन को जाना तो सार्त्र को भी जाना, दोनों के लिखे पढ़े को भी और उनके गरिमामय रिश्ते को भी। उनके बीच की ख़तो-किताबत से भी गुज़रना हुआ। लेकिन अदबी ख़ुतूत के लिए ख़त खंगालते हुए जो ख़त हाथ लगा वो सिमोन ने अपने प्रेमी नेल्सन एल्ग्रेन को लिखा। १९४७ में सिमोन जब शिकागो की यात्रा पर थीं, वहीं उनकी मुलाकात अमरीकी लेखक नेल्सन से हुई। उनके दरम्यान प्यार पनपा जिसे उन्होंने कई बरस तक दूरियों के बीच सहेजा। १९५० में नेल्सन ने इस रिश्ते से खुद को अलग कर लिया और उन्होंने अपनी पूर्व पत्नी से १९५३ में पुनः विवाह कर लिया। यह ख़त सिमोन ने १९५० में रिश्ते के टूटने की तकलीफ से गुज़रते हुए लिखा था।

मैं दुःख के सूखे और गुस्से के ठंडेपन में हूँ, मेरी आँखों में एक आँसू तक नहीं, इतनी सूखी आँखें...लेकिन मेरा दिल...उफ्फ्फ...जैसे सब कुछ बिखर गया है...

(.......)

मैं दुखी नहीं हूँ। हालाँकि आश्चर्यचकित हूँ। खुद से बहुत दूर हूँ और तुम्हारे बहुत बहुत बहुत करीब हूँ। मैं तुम्हें सिर्फ दो बातें बताना चाहती हूँ, इसके बाद मैं तुमसे कुछ भी नहीं कहूँगी, वादा करती हूँ। पहली बात कि मुझमें उम्मीद बहुत है, मैं तुमसे एक बार ज़रूर मिलना चाहती हूँ। कभी, किसी रोज़, कहीं...लेकिन याद रखना मैं तुमसे कभी खुद नहीं कहूँगी मिलने को। इसमें मेरा कोई गुरूर नहीं है, लेकिन मैं चाहती हूँ कि यह मुलाकात तब हो, जब तुम्हें इसकी ज़रूरत महसूस हो, तुम्हें इच्छा हो तो मैं उस पल का इंतज़ार करूंगी। जब तुम्हारी इच्छा हो मुझे बताना।

इसका यह अर्थ नहीं कि मैं यह मानने लगूँगी कि तुम फिर से मुझसे पहले की तरह प्यार करने लगो या मेरे साथ अन्तरंग हो। नहीं, ऐसा नहीं होगा लेकिन मैं यह भी मान नहीं पा रही हूँ कि मैं अब तुम्हें देख नहीं पाऊंगी, कि मैंने तुम्हारे प्यार को खो दिया है और अब तुम्हारा प्यार ‘है’ नहीं रहा बल्कि ‘था’ हो गया है।

जो भी हो नेल्सन, तुमने मुझे बहुत दिया है। और जो तुमने मुझे दिया उसका मेरी जिन्दगी में बहुत महत्व है। तुम चाहकर भी वो सब वापस नहीं ले सकते। तुम्हारा साथ, तुम्हारा एहसास मेरे लिए बहुत कीमती था प्रिय, मैं अब भी वो प्रेम की ऊष्मा, वो ख़ुशी महसूस कर रही हूँ जो तुम्हारी तरफ देखते हुए मेरे दिल में उतरती जाती थी। मुझे उम्मीद है कि हमारी दोस्ती, हमारे रिश्ते की वो नाज़ुकी, वो ऊष्मा कभी ख़त्म नहीं होगी। मुझे यह कहते हुए बहुत अजीब लग रहा है लेकिन सच तो यही है कि मैंने तुम्हें बेपनाह प्यार किया। जब मैं तुम्हारी बाँहों में होती थी तो किस कदर अपने आपको भुला दिया करती थी।

लेकिन मेरे प्यार की वजह से तुमको चिंता में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। न ही मेरे प्रेम के बारे में सोचते हुए किसी ड्यूटी की तरह मुझे ख़त लिखने की। तुम लिखना तब, जब सच में तुम्हारा दिल करे लिखने को यह जानते हुए भी कि तुम्हारे ख़त मुझे किस कदर ख़ुशी से भर देंगे...

ओह, सारे शब्द किस कदर मूर्खतापूर्ण लग रहे हैं। तुम बहुत करीब महसूस हो रहे हो, मुझे भी अपने करीब आने दो प्रिये। बिलकुल वैसे ही जैसे हम पहले करीब हुआ करते थे, मुझे अपने दिल में छुप जाने दो...

तुम्हारी
सिमोन

(प्रस्तुति- प्रतिभा कटियार )

Sunday, August 7, 2016

आज के समाज मेँ प्रतिभा के हीर-रांझा


सुभाष राय
सम्पादक, जन्संदेश  टाइम्स.

प्रतिभा कटियार की कहानी 'मिस्टर एन्ड मिसेस हीर रांझा' समाज मेँ कहीँ बहुत गहरे घट रहे या घट सकने वाले एक सँरचनात्मक बदलाव की कहानी है । यह अपने कथ्य मेँ हीर -रांझा की पारम्परिक कथा को आज के परिप्रेक्ष्य मेँ एक क्रांतिकारी प्रस्थापन से लैस करती है। प्रतिभा कहती हैँ कि रांझा को पराये घर मेँ ब्याह दी गयी हीर के लिये रोते हुए जंगलोँ मेँ भटकने का अनुभव तो था लेकिन बीवी बनकर घर मेँ तकरीर करने वाली हीर को कैसे सहेजना है, इसका कुछ पता नहीँ था। ऐसे मेँ जिस तरह कहानी आगे बढती है, जिस तरह रांझा एक सेल्फ असर्टिँग पुरुष की तरह हीर को समझने की जगह उस पर खुद को थोपना शुरु करता है, किसी को भी लग सकता है कि ये हीर-रांझा जल्दी ही टूट जायेँगे, बिखर जायेँगे लेकिन ऐसा होता नहीँ है।

 रांंझा को यह देखकर आश्चर्य होता है कि हीर उसकी परम्परावादी जकडन मेँ उलझी माँ को भी एक दिन बदल कर रख देती है, एक अर्थ मेँ उसे जीना सिखा देती है। स्त्री अपने लिये जो स्पेस चाहती है, उसकी चिंता पुरुष कहाँ करता है, उसका मन क्या कहता है, इसे कब देखता है। सच तो यह है कि वह प्यार मेँ भी उसे मुक्त नहीँ करता बल्कि जकडे रहता है। हीर यह पसन्द नहीँ करती पर रांझा को उसके तर्क समझ मेँ नहीँ आते। पाठक की यह आशंका कि यहाँ सब -कुछ चकनाचूर हो जाने वाला है, सही साबित नहीँ होती और अचानक एक दिन रांझा को हीर की बातेँ सही लगने लगती हैँ, उसकी समझ बदलने लगती है। हीर तो शादी के बाद भी हीर ही रही पर रांझा का पुरुषवादी सोच अचानक एक छोटी सी घटना से जिस चमत्कारी ढंग से बदलता है, वहाँ कहानी अपनी सहजता मेँ एक झटका खाती दिखायी पडती है। 

लगता है प्रतिभा उसके कान पकडकर घुमा रहीँ हैँ लेकिन इसका कहानी के समूचे प्रभाव पर ज्यादा असर नहीँ पडता है। हीर-रांझा को जंगलोँ से शहर मेँ लाकर भी प्रतिभा उन्हेँ हीर-रांझा बनाये रखती हैँ, यही इस कहानी की विशेषता है।...मैँ हीर हूँ, शादी के बाद भी हीर ही बनी रहना चाहती हूँ,... तुम मुझे पत्नी बनाने पर तुले रहते हो, पत्नी तलाक दे सकती है, पति तलाक ले सकता है, धोखा दे सकते हैँ एक दूसरे को लेकिन हीर-रांझा नहीँ।

 ये प्रतिभा के हीर-रांझा हैँ, ढूँढने पर शायद कठिनाई से मिलेँ लेकिन ऐसे जीवन की सार्थकता से इंकार नहीँ किया जा सकता, जहाँ दोनोँ के लिये एक ही समतल हो मगर स्त्री न श्रद्धा होकर रह जाय, न विश्वास से परे चली जाय। दोनोँ एक दूसरे को बान्धेँ नहीँ मुक्त करेँ।