Sunday, April 30, 2017

रात है..,चाँद है...इंतजारी है...



पुर नूर बशर कहिये या नूरे खुदा कहिये
अल्फाज़ नहीं मिलते सरकार को क्या कहिये...

दिन सूरज के सात घोड़ों पर सवार होकर उगते हैं इन दिनों. किसी छुट्टी का मुंह देखे जमाना बीता. एक दिन में न जाने कितने दिन उगते हैं कि न खुद का होश न किसी की खबर बस कि भागते जाना, पहुंचना कहीं नहीं...हमेशा की तरह. यूँ कहीं पहुँचने की कोई इच्छा भी नहीं.

किसी सुबह की मुठ्ठियों में कैद बूंदों को जबरन छीन लेती हूँ...चेहरे पर गिरी चंद बूंदों की नमी बीते न जाने कितने सूखे दिनों की आंच को मध्धम करने को काफी थी...मेरे मन के शहर को इस शहर से बेहतर कौन जानता है भला कि राह चलते शहर की हवायें पीठ के दर्द को सहला जाती हैं और गालों पर रखती हैं एक बोसा, बेचैन मन को धीरज धरने को कहती हैं.

धीरज कोई बहुत अच्छी चीज़ भी नहीं कि कब तक धरे कोई धीरज. अचानक एक दोस्त याद आता है जिसे धीरज कहकर चिढाया था कभी...फ़िलहाल..कोई धीरज नहीं है जीवन में...लेकिन मैं जीवन में हूँ, और जीवन मुझ में भी...पेड़ों की ओट से झांकता चाँद अपने खेल खेलने में माहिर है...वो मुझे भटका रहा है...मुझे भटकना भा रहा है...

इस भटकाव में शुजात खान साहब की आवाज़ साथ है...सितार वो बजा रहे हैं जिस्म में तरंगे दौड़ रही हैं मानो...सितार पर बजाये सारे राग याद आते हैं..उँगलियों में मिजराब पहने कितना समय बीत गया...रोज सितार को हसरत से देखती हूँ फिर कलाई में बंधी घडी की भागती सुइयों को देखती हूँ...

घडी की सूइयों की मुताबिक मैं भागती हूँ...सितार भीतर बजता है, शुजात खान साहब का इंतजार भी बजता है..वो दादरा सुनने की ख्वाहिश बढती जाती है जिसे पहली बार सुना था उनकी आवाज में...'रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे...मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे...' कोशिश भी की थी सितार पर बजाने की लेकिन वो कोशिश ही थी...कच्ची कोशिश जिसके नाकाम होने में भी सुख रहा..इश्क में नाकाम होकर आप इश्क को बचा लेते हैं ठीक उसी तरह जैसे ज़िन्दगी में नाकाम होकर आप जिन्दगी बचा लेते हैं, मैंने बचा ली है इस दादरा के साथ अपने दिल की लगी भी...

फ़िलहाल...रात है..,चाँद है...शुजात खान साहब की इंतजारी है...

Friday, April 28, 2017

प्यार ही मेरा धर्म है, तुम ही उसके रीति रिवाज़



इंग्लैण्ड के प्यारे रूमानी कवि जॉन कीट्स (1795-1821) ने बहुत छोटी सी ज़िन्दगी जी. लेकिन उस छोटी सी जिंदगी के रंग इतने गाढ़े थे कि उनकी चमक उन रंगों की महक आज तक फ़िज़ाओं में मौजूद है. 23 बरस की उम्र में कीट्स  को पड़ोस में रहने वाली फैनी ब्राऊन से प्यार हो गया. लेकिन ज़िन्दगी कीट्स के हिस्से में इतनी कम आई थी कि प्यार बस प्यार ही रहा, किसी रिश्ते के अंजाम तक नहीं पहुँच सका. ट्यूबरकोलोसिस ने कीट्स की जान ले ली लेकिन उनका प्यार अब भी कायम है... उनकी कविताओं में, उनके खतों में, कुछ इस ख़त में भी...

प्रिय फैनी,

तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. तुम्हें पता है, मैं सब कुछ भूल जाता हूँ सिवाय तुम्हारे। तुम्हारे बिना ज़िन्दगी ठहरने लगती है, मैं तुम्हारे बिना कुछ भी सोच नहीं पाता। तुमने मुझे अपने भीतर समाहित कर लिया है.

मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे मैं तुम्हारे भीतर घुलता जा रहा हूँ. मैं यह सोचकर अचंभित होता हूँ कि किस तरह लोग धर्म के लिए अपनी जान दे देते हैं. यह सोचकर मेरे रोएं खड़े हो जाते हैं कि किस तरह लोग ऐसा कर पाते होंगे. फिर मैं सोचता हूँ कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ शायद लेकिन मेरा धर्म क्या है...

मेरा धर्म है प्यार, मैं प्यार के जान लिए दे सकता हूँ, मैं तुम्हारे लिए जान दे सकता हूँ. प्यार ही मेरा धर्म है और इस धर्म के सारे रीति रिवाज़ सिर्फ तुम हो.

तुम मुझे अपने प्यार की ताक़त से सबसे दूर चुराकर ले जा चुकी हो, जिसका विरोध मैं करना भी नहीं चाहता।

तुम्हारा
कीट्स


Sunday, April 2, 2017

दुःख को विदा



एक स्त्री दुःख को विदा करने जाती है
और देखती रहती है उसे
देर तक दरवाजे पर खड़ी

दुःख भी जाता नहीं एकदम से
ठिठका रहता है ड्योढ़ी पर
ताकता रहता है उसका मुंह
कि शायद रोक ले...

धीरे-धीरे वो अपनी हथेली
उसकी हथेलियों से छुड़ा लेती है
दुःख सर झुकाए देर तक
बैठा रहता है दरवाजे पर

स्त्री के गालों पर बहती नमी
टिमटिमा उठती है
चांद की रौशनी में

इतने बरस के साथी
उदास
डूबे हुए आकंठ स्मृतियों में

भीतर रखा फोन घनघनाता है
वो भारी क़दमों से कमरे में लौटती है
दुःख का हाथ छुड़ाकर
दुःख से कहती है ‘विदा...’

उठाती है फोन
खिल उठता है उसका चेहरा
फोन के स्क्रीन पर 'प्रेम' चमक रहा है
‘मैं जानती थी तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगे’
वो भावुक होकर कहती है

दरवाजे से वापस आकर मुस्कुराता है दुःख...