Tuesday, December 5, 2017

जंगल और चमकीले तारों वाला आसमान-गीता गैरोला

फोटो- कमल जोशी 

गीता गैरोला दी ने अपने संस्मरण 'प्रतिभा की दुनिया' को नहीं दिए  असल में उन्होंने दिल दिया है प्रतिभा को. यह दिल कब चुपके से वो मुझे दे बैठीं और कब चुरा भी ले गयीं पता ही नहीं चला. अब हम पक्की गुइयाँ हैं. वो मुझसे डांट भी खाती हैं और प्यार वाली झप्पियाँ भी देती हैं. उनकी समूची वार्डरोब पर मेरा कब्ज़ा है, उनके वक़्त पर भी, उनके हर अच्छे बुरे लम्हे पर, और अब उनके लिखे पर भी. उनके इन संस्मरणों से गुजरना दिल के सबसे नाज़ुक हिस्सों को छू लेना है, एक कसक को थाम लेना है, त्वचा की सबसे अंदरूनी सतह में कुछ रेंगता हुआ महसूस करना है. इन संस्मरणों को पढ़ते हुए प्रिय मित्र कमल जोशी की यादों में डूब जाना भी है. शुक्रिया गीता दी- प्रतिभा 

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बरसात बीत रही थी। मौसम में ऊब तारी थी। कहीं दूर निकल जाने को दिल छटपटा रहा था। मैंने कमल को फोन किया, कमल दिल ऊब रहा है चलो कहीं चलते हैं पहाड़ों की तरफ। कमल सुनते ही उछल गया, हाँ हाँ क्यों नहीं। बता कब जाना है। मैं थोड़ी झिझक रही थी। जब एक मौसम से दूसरे मौसम में दिन बदलते हैं उसे अस्थमा का दौरा तेज हो जाता है। मैंने पूछा तुम ठीक हो गये क्या? मैं उन दिनों काठगोदाम में थी और कमल कोटद्वार में। बदलता मौसम उसके लिए बीमारी का मौसम होता। उसने मेरी पूरी बात नहीं सुनी और कब जाना है की रट लगा दी। शायद वो भी बीमारी से ऊब रहा था। वैसे भी पहाड़ों में घूमना उसके अस्थमा के दौरों से बाहर निकलने की अचूक दवा होती। हमने तय किया कि ये पैदल वाली ट्रैकिंग नहीं होगी। हम सुविधा अनुसार कभी गाड़ी और कभी पैदल चलेंगे।

हम राजजात जाने वाले रास्ते पर दुबारा जाना चाहते थे। नन्दा देवी राजजात बीते दो वर्ष हो गये थे। वही रास्ते, वही लोग, वही जगहें दोबारा देखने को मन था। जिन लोगों से राजजात के दौरान मुलाकात हुई उनसे दुबारा मिलना रोमांच पैदा कर रहा था और हम 20 सितम्बर 2002 को पहाड़ों से ऊर्जा लेने अपनी रूटीन जिन्दगी की ऊब खतम करने निकल पड़े। बारिश कम हो गई थी, रास्ते थोड़े कम टूटे होंगे ऐसा अनुमान था। कमल कोटद्वार से चल कर श्रीनगर पहुँचेगा और मैं देहरादून से श्रीनगर। क्योंकि ये जाने पहचाने रास्तों में गाँवों को पार करती ट्रैकिंग थी इसलिए पिट्ठू में स्लीपिंग बैग के अलावा कुछ जरूरी सामान रखे। जूतों का विशेष ध्यान रखा क्योंकि एक बार ट्रैकिंग के दौरान नये जूते मुझे परेशान कर चुके थे। करीब 2 बजे जब मैं श्रीनगर पहुँची तो कमल जोशी जी उमस और पसीने से लथपथ मेरा इंतजार कर रहे थे। हमने तय किया कि जहाँ तक की बस मिलेगी वहीं पर आज का बसेरा होगा। ठीक सामने ग्वालदम जाने वाली बस खड़ी थी। हम दोनों बिना कुछ सोचे बस में चढ़ गये। जगह भी मिल गई। पांच मिनट के अन्तराल के बाद बस चल पड़ी। गर्मी से बेहाल हमने चैन की सांस ली।
अब मैंने कमल की तरफ देखा। मेरा आशय समझ कर वो बोला कि ये बस हमें नारायण बगड़ में छोड़नी होगी। वास्तव में हम गलती से भ्रमवश नारायण बगड़ उतर गये थे। अब कुलसारी जाने के लिए कोई साधन मिल गया तो ठीक नहीं तो देखेंगे। जिस समय हम नारायण बगड़ पहुँचे शाम की परछाइयाँ गदेरों में पसर रही थी पर चोटियों में उजास बाकी था। दिन छोटे होने लगे थे, वहाँ उतर कर हमने एक दुकान में अपना परम्परागत खाजा बन और चाय ली। सामने दो ट्रक खड़े थे। ट्रक के ड्राइवर भी वहीं पर चाय पी रहे थे। देर शाम दो अजनबी लोगों को देख कर उन्हें जिज्ञासा होना स्वाभाविक था। एक ने कमल से पूछा भाई जी कहाँ से आये, कहाँ जाना है। कमल तो गप्पें मारने को हमेशा तत्पर रहता है बोला यार जाना तो कुलसारी था पर अब यहाँ से जाने के लिए क्या मिल सकता है। इत्तिफाक था कि वो ट्रक का कन्डक्टर था और वो लोग सामान लेकर थराली, चैपड़ों तक जाने वाले थे। मेरी तरफ सवालिया नजरों से देखते हुए कमल ने खुश होकर अपने दोनों हाथ जोर से रगड़े और बोला यार भुला तुम लोग अपने ट्रक में हमें कुलसारी तक ले जा सकते हो। ट्रक में जाने की बात को लेकर उसने सहमति के लिए मेरी तरफ देखकर सिर हलाया हाँ या ना। मैंने धीरे से सिर हलाकर अपनी सहमति जताई। हालांकि ट्रक ड्राइवर को देख कर मुझे लग रहा था कि बन्दा या तो अभी से मस्त है या रास्ते में हो जायेगा।
जब हम कुलसारी में उतरे तो शाम खूब गहरा गई थी। आसमान से तारों के झुण्ड अपनी रोशनी से हमें रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे थे। हमने तय किया कि हम कुलसारी नन्दा देवी मन्दिर से लगे मठ में रहने वाली माई जी के साथ रहेंगे। सन 2000 में राजजात जाते समय मैं माई जी के साथ रुकी थी। अंधेरे में अपने दरवाजे पर दो अजनबियों को इतनी रात खड़े देख माई जी जोर से बोली कौन है— मैंने कहा माई जी नमो नारायण, मैं हूँ राजजात के समय आप से मिली थी। आज रात आपका आसरा चाहिए। माई जी ने एक औरत की आवाज सुन कर दरवाजा खोला और पहचानने की कोशिश करने लगी। मैं फिर बोली माई जी बड़ी आस लेकर आये हैं आपके द्वार, अरे आ जा बेटा भीतर आ जा। जूते बाहर ही उतार कर हम अन्दर गये। भूख थी पर झिझक भी थी। सोचा रात गुजार देते हैं, माई जी को परेशान नहीं करेंगे। पर माई जी ने नमक डली मोटी—मोटी घी लगी रोटी और दूध का गिलास हम दोनों को दिया। माई जी ने मुझे अपने पास बुलाया और बातें करने लगी।
आज का पूरा दिन सफर की हड़बड़ी में ही गुजर गया। सुबह पाँच बजे चल देंगे यहाँ से, अंधेरे में कमल की आवाज आई। मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी, अभी तो माई जी से बात करनी बाकी थी। मैं सुबह की उजास होते ही पिन्डर में नहाने के लिए चली गई। आने पर जोशी जी मुँह फुलाये माई जी के पास बैठे चाय सुड़क रहे थे। कुलसारी में त्रिमुखी शिव और दक्षिण काली का मन्दिर है। काली का श्रीयंंत्र भूमिगत है। प्रत्येक राजजात में बलि देने के बाद श्रीयंत्र को निकाल कर पूजा करने का नियम है। पर दो हजार की राजजात में बलिप्रथा पर प्रतिबंध होने के कारण श्रीयंत्र को नहीं निकाला जा सका था।

माई जी अपने साफ सुथरे मठ में अपने आसन पर बैठी हमसे बातें करने लगी। मुझे पता था कि माई जी कहीं पौड़ी की रहने वाली हैं। मैं उनसे गढ़वाली में बात करने लगी। पता चला माई जी रिखणीखाल ब्लॉक की रहने वाली हैं। 1962 में 22 साल की उम्र में उन्होंने सन्यास ले लिया। चार साल भ्ौरवगढ़ी के मन्दिर में रहकर 1966 अप्रैल से कुलसारी में हैं। 22 साल की भरपूर यौवनावस्था में दीक्षा लेकर घर छोड़ने के पीछे कोई बड़ा कारण रहा तो होगा। पहाड़ों में युवा महिलाओं के पति की मृत्यु हो जाने पर महिलाओं की जोगिन बन जाने की घटनाएँ उस समय बहुत आम हुआ करती थी। मैंने माई जी को कुरेदने की कोशिश की। मैतो गौं कख च माई जी। अरे बाबा जोगी का कोई गाँव, कोई मैत, कोई घर नहीं होता। माई जी अपने गंजे सिर पर हाथ फिराते हंसते हुए बोली। मेरा सब यही कुटिया है। बात खतम करने के आशय से माई जी ने चाय के गिलास उठा लिए। कुछ तो बताइये अपनी कहानी माई जी मैंने बात बढ़ाई। अरे क्या बात अर क्य छ्वीं। बस जब औरतों के सारे सहारे खतम हो जाते हैं तो वो सन्यास न लें तो कहाँ जायें। मुझे माई जी की इस बात से सारी कहानी समझ में आ गई। कोई भी औरत स्वेच्छा से दुनियादारी क्यों छोड़ेगी, कुछ तो सामाजिक दुष्कारियां रही होंगी। हमारे समाज में औरतों की जगह ही कहाँ होती है। पता चला माई जी के पति चल बसे थे। ससुराल का दरवाजा बंद हुआ तो मायके आ गई। मायके पर बोझ बनी तो जोगन बन गई। औरतों की इतनी कम जगह होती है हमारे समाज में, कितनी बिडम्बना है।

माई जी अब तक तीन राजजात देख चुकी हैं। 1968, 1987 तथा 2000 की। कमल ने पूछा कि तीनों जातों में आपको क्या फर्क लगा। माई जी बोली 1968 की जात में ज्यादा से ज्यादा 200 लोग रहे होंगे। जात वही जाते थे जिनकी आस्था बलवान होती। 2000 की जात में लोगों के साथ सैलानियों की संख्या बढ़ गई, लगभग 3000 लोगों ने जात में भाग लिया। 1987 वाली जात में कमल भी भाग ले चुका था। उस समय उसने माई जी को नहीं देखा था पर 2000 की जात में जब मैं राजजात में गई तब हम माई जी से मिले थे, खूब बातें की थी। पहले पूरी जात लोक आधारित होती थी। 1987 से प्रशासन व्यवस्थाएं करने लगा है। 2000 की जात में तो स्थानीय प्रशासन ने यात्रियों के रहने की भी व्यवस्थाएँ की थी। हम माई को प्रणाम कर अपने पिट्ठू पीठ में लादे कुलसारी गाँव में आ गये। आसमान में बादलों की चहल कदमी के बीच धूप झांक रही थी। खेत धान—मक्के, ककड़ी और सब्जियों से लकदक थे। सड़क कुलसारी गाँव के बीच से निकलती है। पिण्डारी ग्लेशियर से निकल कर बड़े—बड़े पत्थरों से टकरा कर गरजती पिण्डर नदी के किनारों पर बसे गाँव जंगलों से भरपूर थे। महिलाओं के लिए घास—लकड़ी की समस्या नहीं होगी इन गाँवों में। गाँव के बीच मुझे दो महिलाएँ सड़क पर दिखाई दी। बड़ी उम्र की महिला को दीदी नमस्ते आदतन कहा। दोनों में एक महिला गंगा कुलसारी की बेटी थी और दूसरी उसकी भाभी थी। और उसका नाम नन्दा था। इस इलाके में हर तीसरी लड़की का नाम नन्दा होता है। गंगा का ससुराल ग्वालदम के पास किसी गाँव में था। गाँव में नन्दा देवी की पूजा थी इसलिए गंगा अपने मायके आई थी। मैंने संवाद बढ़ाया। दीदी इस पूरे इलाके में लड़कियों को स्कूल भेजते हैं कि नहीं भेजते। भुलू सब भेज रहे हैं। आठ पास स्कूल तो सब जगह नजदीक हो गये, तो आठ तो पढ़ा ही लेते हैं। बाकी तो जिसके पास साधन है आगे भी पढ़ा लेते हैं। और शादी कितने बरस में करते हैं? दोनों हंस पड़ी—ज्वान होकर, आजकल कौन करता है जल्दी शादी। सब ज्वान होकर करते हैं। इतने में उनकी गाड़ी आ गई और हम चैपड़ों की तरफ चल दिये। उन दोनों को इस बात का बहुत आश्चर्य था कि सड़क होते हम पैदल क्यों जा रहे हैं। शायद हमें बेवकूफ समझ रही होंगी।

जब मैं 2000 की राजजात में आई थी तब सड़क की स्थिति ठीक थी, डामर वाली सड़क थी। डामर अभी भी थी पर जगह—जगह गड्ढे बन गये थे। मुझे अपने शासन—प्रशासन की व्यवस्थाओं पर हँसी आई। कमल समझ गया और बोला अरे अगली जात तक सड़क बन जायेगी चिन्ता मत करो। गाँव से लगभग एक किलोमीटर के बाद हमें रास्ते में दो व्यक्ति मिले जो अपनी रिश्तेदारी में जा रहे थे। कमल ने नमस्कार जी जोर से बोला। वो लोग भी हमारी जोरदार नमस्कार सुन कर मुस्करा दिये। तभी पता चला कि वो तेरहवीं में जा रहे हैं। कमल ने अपने और मेरी राजजात में जाने की बात कही तो वो स्नेह दिखाने लगे। रास्ते में सड़क के किनारे एक लड़का छोटी सी दुकान लगाये चाय बना रहा था। हम चारों वहीं चाय पीने बैठ गये। इस बहाने बात भी होने लगी। चाय पीने के बाद हम पैसे देने लगे तो उनमें से एक व्यक्ति ने कान पर हाथ लगाते कहा— अजी तुम कैसी बात करते हो, हमारे मेहमान हो। घर पर मिलते तो खाना खिलाते, यहाँ पर चाय तो पिलाने दो। पैसे देकर हम पर पाप मत लगाओ। मुझे याद है जब हम जात में आये थे, तब छोटी से छोटी चीज को पैसा देकर लिया था हमने। ये फर्क है 
जब हम बाजार साथ लेकर चलते हैं और जब हम केवल पहाड़ी व्यक्ति बन कर पहाड़ों में जाते हैं।

दिन चढ़ने के साथ धूप ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये। मैं सड़क किनारे छाया में बैठी दो लड़कियों के पास पिट्ठू खेत की मेड़ पर टिका कर खड़ी हो गई। दोनों स्कूल से घर लौट रही थी। दीना और सुरमा नाम थे उनके। धूप से दोनों के गाल लाल हो रहे थे। उन्हें अभी रास्ते में पड़ने वाले अपने खेत से घास काटकर ले जाना था। इसलिए शर्माती हुई जल्दी से चलने को तैयार हो रही थी। गर्मी से मुझे नीचे तेजी से शोर मचाती बहती नदी में नहाने का मन करने लगा था। अपने मन की बात उन पर थोपती बोली— तुम लोग तो खूब नहाती होंगी न नदी में। अब तक हम लोगों में जरा दोस्ती हो रही थी। उन्हें मेरे कटे हुए बाल और पीठ में लगा पिट्ठू आकर्षित कर रहा था। दीना मेरे पिट्ठू को छूते हुए बोली— अरे नहाने कौन जाता है दीदी— किसे फुर्सत है, हाँ कभी—कभी कोई औरत फाल देने जरूर चली जाती है। मेरा दिल जोर से धड़का। मैंने आश्चर्य से उसे देखा, नदी में कूद कर आत्महत्या करने की करुणा को कितनी सहजता से कह गई लड़की। इतना हरा—भरा घास, लकड़ी, जंगल, खेती, अनाज से सम्पन्न इलाका है, तब भी कौन से कारण हंै कि औरतें आत्महत्या कर लेती हंै। हमने पिण्डर नदी के ऊपर बना पुल पार किया और थराली बाजार पहुँच गये। थराली में काफी बाजार बन गया है। बरसात में आम तौर पर पहाड़ी कस्बों की गंदगी बह जाती है पर थराली के पूरे बाजार में गंदगी बिखरी पड़ी थी। हमने वहाँ से थोड़े सेब खरीदे और जल्दी जल्दी चैपड़ों की तरफ चल दिए।

लो भई चैपड़ो आ गया। हम दोनों ही थक रहे थे और भूख से भी बेहाल थे। राजजात के समय मैं गाँव में नारायण सिंह साह जी के नये बने घर में रुकी थी। हमने चैपड़ो के एक ढाबे में खूब मिर्ची वाली दाल और रोटी खाई। मैंने दही की माँग की तो जोशी लार टपकाते हुए मुझसे आधी दही मांगने लगे। सन् 2000 में जब मैं नारायण शाह जी से मिली थी तब उनके युवा पुत्र की मृत्यु हुई थी और वो लोग बहुत शोक विह्वल थे। इस बार गाँव में उनके घर जाने पर वो खुद तो नहीं मिले पर उनकी पत्नी से मुलाकात हुई, याद दिलाने पर मुझे पहचान भी गई। वो नाराज हुई कि हम होटल से खाना खा के क्यों आये। उन्होंने हमें चाय पिलाई और हम अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े।
सड़क पर हमें एक छोटा ट्रक मिल गया जो सीधे मुन्दोली गाँव जा रहा था। ट्रक में हमारे अलावा खिलाफ सिंह भी बैठे थे। सड़कें जगह—जगह टूटी और गड्ढों से भरी थी। चारों तरफ बरसात की गहन हरियाली अपना आंचल फैलाये मन मोह रही थी। अब तक की यात्रा में कमल कम ही बोला था। अस्थमा की दवाइयाँ खाने के बाद बोलने में उसकी जीभ लटपटाती है और सांस भी विषम हो जाती है, वो बस सफर का मजा ले रहा था। बोलने—बात करने की जिम्मेदारी मुझ पर थी। मैंने घने जंगल देख के पूछा— भाई यहाँ पर जंगलों को बचाने के लिए वन पंचायतें भी हैं। खिलाफ सिंह ने बताया हाँ है न। केवल कोट गाँव में सात गाँवों की फोरेस्ट पंचायत है और ये वन पंचायत 1947 में बन गई थी। सन् 2000 के बाद वहाँ जे.एफ.एम. (ज्वाइन्ट मैनेजमेंट) लागू हो गया है, लोग जे.एफ.एम. के बारे में नहीं जानते पर उससे गाँव में पैसा आयेगा ये उन्हें पता है। मैंने सोचा बस अब इनके हाथ से जंगल गया। बातें करते हम मुन्डोली पहुँच गये। मुन्दोली समुद्र तट से 2050 मीटर की ऊंचाई पर बसा घने जंगलों से घिरा खूबसूरत गाँव है। यहाँ तक कच्ची सड़क बन पाई है। दो साल पहले राजजात में भी ये सड़क कच्ची ही थी। यहाँ पर हमें मिलिट्री से रिटायर सुबेदार जी के घर में बैठ चाय—पानी के बाद रात को रूकने का निमंत्रण भी मिल गया।

मुन्दोली से 2 किमी. चढ़ाई पर लोहाजंग गाँव है, पर हमें मुन्दोली में ही रूकना था। मुझे याद आया कि जब हम राजजात में इस गाँव में आये थे तब प्रशासन द्वारा खाने रहने के रेट तय किये गये थे पर गाँव के किसी भी व्यक्ति ने रहने का कोई पैसा नहीं लिया था। मुन्दोली घनी आबादी वाला साफ सुथरा गाँव है।

शाम ढल रही थी, मौसम खूब सुहाना और ठण्डा था। अजनबी लोग खास कर महिला देख कर कुछ महिलाएँ, लड़कियाँ, बच्चे भी आ गये। वो लोग जिस तरह की बोली बोल रहे थे उसमें गढ़वाली—कुमाउंनी दोनों मिक्स थी और मुझे अच्छी गढ़वाली आने के बावजूद समझने में परेशानी हो रही थी। फिर भी मैं सबसे गढ़वाली में ही बात करती रही। कमल को इस बात का एडवांटेज मिल रहा था कि वो चमोली का रहने वाला है। सुबेदार साहब के परिवार वाले बहुत स्नेही थे। मुन्दोली नन्दा देवी राजजात का पड़ाव है। यहाँ पर भूम्या जैपाल देवता का मन्दिर है जिसमें नन्दा देवी की कटार रखी हुई है। गाँव के सभी घरों में लोग रहते हैं। गाँव के कुछ लोग नौकरी करते हैं पर अभी प्रवास से बचा हुआ गाँव है। गाँव की चार महिलाएँ टीचर बन गई हैं? लड़कियाँ घर के कामकाज के साथ स्कूल भी जाती हैं। पर सामान्य तौर पर घर—खेती का काम सम्भालती है? गाँव की महिलाओं ने नन्दा देवी के जागर भी सुनाये। ये हमारी यात्रा का आखिरी पड़ाव था। रात को बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज बारिश शुरू हो गई, पर हम निश्चिन्त थे कि अब कल हमें वापिस जाना है।

(युगवाणी पत्रिका में प्रकाशित)

जारी...

3 comments:

Dr Kiran Mishra said...

पहाड़ो की महक लिए यात्रा लेखन की बेजोड़ ���� यात्रा लेखन की यूं ही जारी रहे ���� शुभकामना।

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-12-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2810 में दिया जाएगा
धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर